[2022] Jharkhand art |झारखण्ड की प्रमुख चित्रकलाएँ-Most important details.

Jharkhand art| भारतवर्ष के पूर्वी हिस्से में बिहार के दक्षिणी तथा बंगाल के पश्चिम में अवस्थित पठारी भू- भाग झारखण्ड के नाम से जाना जाता है । पहले यह दक्षिण बिहार के नाम से जाना जाता था, किन्तु 15 नवंबर 2000 को इसे  भारत गणराज्य का 29 राज्य बना दिया गया है ।

यह राज्य खनिज संपदाओ से भरी हुई है साथ ही यह राज्य विभिन्न प्रकार की जनजातियो और उनकी परम्पराओ से भी परिपूर्ण है I यहाँ के लोग प्रकृति की पूजा करते है I यहाँ के लोगो का प्रकृति से प्यार देखते बनता है I

यहाँ की प्रमुख जनजातीय है मुंडा ,उराव,संथाल,खड़िया, करमाली इत्यादि I

कला का उद्देश्य भावनाओं, अनुभवों और विचारों को व्यक्त करना है जो भाषा की पहुंच से बाहर हैं। यह कला सौंदर्य, आनंद  एवं प्यार के  साथ न्याय गरिमा और प्रतिरोध को भी व्यक्त कर सकता है। 

आज हम मुख्य रूप से झारखण्ड की कला के बारे में जानेगे I

कोहबर चित्रकला :-

झारखण्ड के  बहुत  जिलो में कोहबर चित्रकला की परम्परा रही है | ये शब्द कोह +बर से मिल कर बना है , कोह या फिर यु कहे की खोह यानि गुफा और बर यानि दूल्हा इन दोनों को जोड़ दे तो कोहवर का मतलब होता है दुल्हे का कमरा I ये चित्र कला आज भी इसी नाम से प्रचलित है I मधुबनी/दरभंगा आदि स्थानों पर भव्य रूप से बनाया या लिखा जाता है। संभवत: आज की कोहबर कला झारखण्ड में पायी जाने वाले सदियों पुराने गुफाचित्रों का ही आधुनिक रूप है।हजारीबाग के कोहबर चित्रकला के चित्रकार मुख्यतः आदिवासी हैं।

मिटूटी की दीवारों पर प्राकृतिक एवं खनिज बनाये जाने वाला यह चित्रण पूरी  तरह से महिलाओं द्वारा किया गया है। यह चित्रण बहुत ही कलात्मक है और इतना स्पष्ट होता है कि पढ़ा जा सकता है। कोहबर के चित्रों का विषय सामान्यत: प्रजनन, स्त्री -पुरुष संबंध, जादू-टोना होता है, जिनका प्रतिनिधित्व पतियों,पशु -पक्षियों, टोने-टोटके के ऐसे प्रतीक चिन्हों द्वारा किया जाता है, जो वंश बृद्धि के लिये प्रचलित एवं मान्य हैं|

जैशे-बांस, हाथी, कछुआ, मछली, मोर, सौप, कमल या अन्य फूल  आदि। इनके अलावा शिव की विभिन्न आकृतियों और मानव आकृतियों का प्रयोग  भी होता है । ये चित्र घर की बाहरी अथवा भीतरी दीवारों पर पूरे आकार में अंकित किये जाते हैँ।

हजारीबाग जिले के जोरकाठ, इस्को, शंरेया, सहैदा, ढेठरिगे, खराटी, राहम आदि गाँवों में कोहबर चित्रांकन सदियों से होता आ रहा है।

सोहराई चित्र :-

सोहराई झारखण्ड  एक बहुत ही महत्वपूर्ण उत्सव है जो दिवाली के ठीक आगले दिन मनाया जाता है| इसमें  यहाँ के लोग सुबह आपने पशुओ को जंगल की तरफ ले जाते है और दोपहर को वापस घर पर आने के समय ये लोग पशुओ को अपने घर के द्वार पर इनका स्वागत करते है| इस क्रम में लोग पहले अपने द्वार पर अरिपन का चित्रण करते हैं।

अरिपन  भूमि पर किया जाता है। जमीन को साफ कर उस पर गोबर/पिटूटी का लेप लगाया  जाता है,फिर चावल के आटे से बने घोल से अरिपन का चित्रण किया जाता है। ज्यामितीय आकार में बने इन चित्रों पर चलकर पशु घर में प्रवेश करते हैं। यह चित्रण भी घर की महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है। इन लोक कलाओं की शिक्षा हर बेटी अपनी माँ या घर की अन्य वरिष्ट महिलाओं से पाती है।

कोहबर एवं सोहराई चित्रों में विभिन्न आदिवासी समूह या उपजाति के अनुसार, थोडी भिन्नता पायी गईं है।

जादोपटिया :-

जादोपटिया भी झारखण्ड की एक प्रमुख चित्र कलाओ में से एक है | यह झारखण्ड की एक प्रमुख जनजाति के द्वारा बनाया जाता है जिसको  “जादो” कहते है I “जादो” इसे वंश परम्परा  एवं वंशानुगत व्यवसाय के रूप में बनाते हैं। ‘जादो’ समुदाय को संताली समाज में पुरोहित का दर्जा प्राप्त है। ये घुमंतू प्रवृति के होते हैं और गॉव के बाहर वास करते हैं। हमारे देश के विभिन्न भागों में भी पट-चित्र बनाने की परम्परा रही है ।

यह  मूलत: बंगाल से  झारखण्ड पंत के संताल परगना से आकर प्रचलित हुआ है। यह चित्र शैली बंगाल की पटुआ  चित्र शेली से मिलती-जुलती  है। इसको बनाने के लिए छोटे-छोटे कपडों के टुकडे या कागज के टुकडों का इस्तमाल किया जाता है | इन टुकड़ो को जोड़ कर लगभग 6 से 10 फीट लम्बे पट बनाये जाते हैं। इसके बाद इस पर प्राकृतिक रंगों से विषय वस्तु का क्रमबार चित्रण किया जाता है। मुख्यत: लाल, हरा, भूम, मीला, नीला एवं वाले रंग का प्रयोग होता है। ये रंग हल्दी, मुर्गा लकडी, हरे पत्तों के रस, नील एवं एक विशेष पत्थर को घिस कर बनाया जाता है I

चित्रों की विषय वस्तु पहले संतानों को उत्पत्ति की कथा, संताल समाज के मिथकों पर आधारित कथा हैं राम कथा, कृष्ण, साला, जीवन मरण एवं यमराज का दण्ड विधान होता था, पर बाद के दिनों में पर्व-त्यौहार , महारभारत एवं रामायण पर आधारित कथाएँ भी चित्रित की जने लगीं।

इन चित्रों को बनाने के समय यहस के लोग एक पारम्परिक लोकगीत भी गाते है I

बन्दना चित्रकला  :-

 ये चित्रकला आश्चिन महीने  मनाये  जाने वाले  वन्दना  पर्व’ में किया जाता है | ये भी एक प्रमुख  पर्व’ है झारखण्ड का, इसमें लोग खेती में प्रयुक्त होने वाले जानवरों की पूजा करते है I लोक चित्रकला के माध्यम से ग्रामवासी अपनी भावनाओं को, सृजनशीलता एवं अपने आनन्द की अभिव्यक्ति करते हैं। इस अवसर पर अपने परिवेश एवं घर आँगन की साफ-स्रफाई की जाती है। भूमि एवं दीवारों के गड्ढे  भरे जाते हैं।

फिर उनपर मिट्टी का लेप लगाया जाता है । संताल अपने घरों की दीवारों को अलग-अलग रंग की मिट्टी से आकर्षक तरीके से लीपते है, मिट्टी की विभिन्न रंगों से  चौडी ज्यामितीय आकारों से दीवारों को सजाया जाता है। गीली मिट्टी के लेप  के प्रयोग से लहरदार आकर्षक पैटर्न बनाये जाते हैं। फिर उनपर पक्षी, जानवर, मानवाकृति या फूल-पत्तियाँ आदि उकेरी जाती हैं। इस काम  को पूरी तरह घर की महिलाएँ ही करती हैं और यह पूरी लगन और निष्ठा से किया जाता है। घर के द्वार पर या आँगन में ‘अल्पना’ बनाने का रिवाज भी है । फूल-पतियों की आकृतियों से बनाई गई अल्पना के बीच में ‘देवी’ के पैरों की आकृतियों” बनाई जाती हैं।

इन सारी चित्रकलाओ को पढने के बाद आप खुद ही समझ गए होंगे की झारखण्ड वासी, प्रकृति से कितना प्यार करते है और इनलोगों को प्रकृति से कितना लगाव हैIआप इन चित्रकलाओ को जरुर देखने जाइये|

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